संकट में ही संस्कारों की परीक्षा होती है

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भारत में करोना महामारी को लेकर सरकार द्वारा घोषित लॉकडाउन व अपने स्थान पर बने रहने के आग्रह के बाद भी हजारों श्रमिक दिल्ली, नॉएडा, गुरुग्राम, गजियाबाद व देश के अन्य कई भागों, प्रांतों से पैदल ही ५००-७०० किमी चलकर अपने गाँव घरों तक पहुँचे। रास्ते में किसी को खाना मिला,कोई भूख के साथ ही चला व चलता रहा संकट की घड़ी में अपनों के बीच सुरक्षित पहुँचने के ईंधन के साथ।

इस लंबी थका देने वाली व ख़तरनाक यात्रा में किसी ने ना प्रशासन को कोसा ना नेताओं को , किसी ने धरना प्रदर्शन नहीं किया कि हमको साधन उपलब्ध किए जाएँ, हमारे भोजन पानी की व्यवस्था हो,किसी नेता को फोन नहीं हुआ किसी प्रशासनिक अधिकारी को प्रार्थना नहीं की गयी।

ना उन्होंने मार्ग में खड़ी गाड़ियों को कोई हानि की , ना ही किसी सरकारी या व्यक्तिगत संपति को जलाया , सब चुपचाप इसे प्रकृति का कोप समझ भगवान से अपने व परिजनों के जीवन की रक्षा की प्रार्थना करते हुए चलते रहे। कुछ युवकों ने तो विडीओ पर कहा मोदी जी हमें गाड़ी घोड़ा नहीं चाहिए हम पैदल ही घर पहुँच जाएँगे परंतु आप देश को बचा लीजिए।

ना वो आतंकी बने ना बंदूक उठायी ! यह है भारत व इसकी संस्कृति ! कहाँ से लाएँगे आप ऐसी सूझ व भावनाएँ ? यह संस्कार व परम्पराएँ हज़ारों वर्षों के तप व अनुशासन का फल हैं ।पश्चिमी अधपके विचार दर्शन यह सब नहीं समझा सकते , एक पुस्तक या व्यक्ति इस जीवन शैली को विकसित नहीं कर सकता यह एक निरंतर चलते रहने वाली संस्कारों की साधना है। हज़ारों ऋषि-मुनियों , संतो के तप का पुण्य है कि इस वैश्विक महामारी का प्रकोप भारत में अभी तक न्यूनतम ही है ।

दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय के युवा जो बिहार से दिल्ली व अन्य नगरों में रोज़गार के लिए आये हैं वो बिहार के मुख्यमंत्री को अभद्र गालियाँ विडीओ में देते हुए इंटर्नेट पर देखे जा सकते हैं। यह संस्कारों का परम्पराओं का पुरखों की दी हुई सीख का परिणाम है ।

गर्व है मुझे मेरे इन हिंदू बंधु बांधवों पर व गर्व है अपने हिंदू होने पर , गर्व है कि इस पुण्यभूमि भारत में मेरा जन्म हुआ है जहां के युवा आज अपने जीवन को संकट में डालकर भी भूखे श्रमिकों को भोजन व जीवन निर्वाह की अन्य सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं। धन्य हैं वो माता पिता व संस्कार जहां से प्रेरणा मिलती है।

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